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Kabir Ke Dohe in Hindi PDF | Best 900+ कबीर के दोहे PDF Download

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Kabir Ke Dohe PDF Download Overview

PDFDetails
NameKabir Ke Dohe In Hindi PDF
AuthorKabir Das
File TypePDF
Size1 MB
Pdf Pages83

कबीर के दोहे Kabir Ke Dohe in Hindi PDF के लिए डाउनलोड लिंक इस लेख के अंत में दिया गया है। आपको सीधे Download Link पर करके PDF प्राप्त कर लेना है।

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कबीर के दोहे अर्थ सहित व्याख्या Kabir Ke Dohe With Meaning in Hindi PDF

महान संत कबीर दास जी का जन्म काशी के एक जुलाहे परिवार में हुआ था। जो इस समय उत्तर प्रदेश में वाराणसी के नाम से जाना जाता है। कबीर दास जी भारत के महान कवियों में से एक हैं जिन्हें बहुत ही सम्मान की‌ दृष्टि से देखा जाता है। कबीर दास जी के दोहे हमें बहुत कुछ सिखाती हैं और जीवन जीने की राह दिखाते हैं। समाज की वृत्तीय कैसी हैं उनका सच्चाई बताती हैं। इस लेख के अंतर्गत मैं आपको कबीर दास के 10 बहुत ही मशहूर दोहे का अर्थ बताऊंगा बाकी के Best 900+ Kabir Ke Dohe in Hindi PDF इस लेख के आखिरी में दे दूंगा।

Kabir Das Ke 10 Dohe in Hindi

  1. Bura Jo Dekhan Main Chala Kabir Ke Dohe

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय ॥

इसका अर्थ है की: कबीरदास जी कहते हैं कि जब मैं संसार में कमियाँ/बुराइयाँ ढूंढने निकला तब मुझे यह ज्ञान हुआ कि पूरे संसार में सबसे ज्यादा कमियाँ तो मुझमे ही हैं, इसलिए कबीर मानते हैं कि संसार को सुधारने से पहले स्वम को परिष्कृत एवं परिमार्जित करना आवश्यक है।इस दोहे के माध्यम से कबीर ने आत्मावलोकन पर दृष्टिपात किया है।

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  1. Kabir Das Ke Dohe Kal Kare So Aaj Kar

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥

इसका अर्थ है की: कबीर इस दोहे के माध्यम से व्यक्ति में व्याप्त आलस्य और काम को कल पर टाल देने की प्रवृत्ति को बुरा बताते हुए कहते हैं कि जो कुछ कल के लिए टाल रहे हो उसे आज करना ज़रूरी है, और जो आज करना है उसे अभी, अन्यथा समय निकल जाने पर केवल पछतावा ही हाथ लगेगा।

  1. Guru Govind Dou Khade Kabir Ke Dohe

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय।।

इसका अर्थ है की: उपरोक्त दोहे में कबीर अपनी दुविधा का वर्णन करते हैं कि गुरु और गोविन्द (ईश्वर ) दोनों खड़े हैं मेरे आगे, अब मेरी दुविधा है सबसे पहले चुनाव का कि मैं पहले किसके समक्ष नतमस्तक होऊं क्योंकि मैं तो अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ और ईश्वर तो सबसे महान है ही ऐसे में मैं पहला चुनाव किसका जाय? लेकिन कबीर के जीवन पर उनके गुरु का प्रभाव ईश्वर से कहीं अधिक था इसलिए वो ईश्वर से पहले गुरु को श्रेष्ठ मानते हैं।

  1. Kabir Ke Dohe Aisi Vani Boliye

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

इसका अर्थ है की: इस दोहे में कबीर वचन की शुद्धता और शब्दों के चुनाव की बात करते हैं, जिसमें वो कहते हैं कि हमें सदैव ऐसा बोलना चाहिए जो दूसरों को भी अच्छी लगे और ख़ुद को भी, अर्थात् ऐसी कोई बात मत बोलिये जिससे किसी को आघात पहुँचे, बोले जाने वाले शब्दों का चयन बहुत सोच समझ कर करिये।

  1. Jaati na Puchho Sadhu ki kabir Ke Dohe

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान ।।

इसका अर्थ है की: कबीर कहते हैं कि साधु या ज्ञानी से उसकी जाति नहीं पूछी जानी चाहिए बल्कि उससे उसका ज्ञान पूछा जाना चाहिए जो कि उस ज्ञानी की वास्तविक पहचान है, इसी संदर्भ में ‘दिनकर’ जी ने कर्ण से कहलवाया है कि
“पाते हैं सम्मान तपोबल से भूतल पर शूर,
‘जाति-जाति’ का शोर मचाते केवल कायर, क्रूर।”

  1. Kabir Ke Dohe Pahan Puje Hari Mile

पत्थर पूजें हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार।
तातें तो चक्की भली, पीस खाये संसार ।।

इसका अर्थ है की: कबीर उपरोक्त दोहे में समाज में व्याप्त आडम्बरों पर चोट करते हैं और कहते हैं कि अगर पत्थर पूजने से ईश्वर की प्राप्ति होती है तो मैं पूरे पहाड़ की पूजा करने के लिए तैयार हूँ लेकिन ऐसा नहीं है बल्कि उस पत्थर से अच्छी तो चक्की है जिससे आटा पीस कर संसार रोटी खाता है।

  1. Bada Hua To Kya Hua Kabir Ke Dohe

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर ।
पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ।।

इसका अर्थ है की: कबीरदास जी का मानना है कि इस तरह बड़े होने का कोई अर्थ नहीं है जब आपसे कोई लाभान्वित ही न हो अर्थात् आपके बड़े होने का समाज को लाभ मिलना ज़रूरी है, क्योंकि खजूर के वृक्ष की तरह बड़ा होने का कोई तात्पर्य नहीं जो कि न किसी राहगीर को छाया देता है और उसके फल भी बहुत दूर लगे होते हैं।

  1. Kabir Das Ke Dohe Sabd Vichari Jo Mile

शब्द विचारी जो चले, गुरुमुख होय निहाल |
काम क्रोध व्यापै नहीं, कबूँ न ग्रासै काल ||

इसका अर्थ है की: गुरु के कहे शब्दों के हिसाब से जो चलता है उसमें काम, और क्रोध नहीं टिकते उसे काल कभी डस नहीं सकता अर्थात् गुरु के कथनानुसार चलने पर आप श्रेष्ठ जीवन जीते हैं इसलिए गुरु की अवज्ञा नहीं करनी चाहिए।

  1. Dukh Me Sumiran Sab Kare Kabir Ke Dohe

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय ।।

इसका अर्थ है की: ईश्वर का ध्यान सदैव रखना चाहिए न कि केवल दुःख में अतैव कबीर कहते हैं कि होता यह है लोग दुःख आने पर तो ईश्वर का स्मरण करते हैं लेकिन सुख आते ही भूल जाते हैं उन्हें, यदि सुख में भी ईश्वर का ध्यान रहे तो दुःख का अस्तित्व ही नहीं होगा।

  1. Nahaye Dhoye kya hua Kabir Ke Dohe

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए ।
मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।।

इसका अर्थ है की: कबीर दास जी उपरोक्त दोहे में मन के शुद्धि की बात करते हुए कहते हैं कि यदि आपका मन मैला है तो आप कितना भी नहा धो लीजिये उसका कोई मतलब नहीं है जैसे मछली लगातार पानी में ही रहती है लेकिन उसकी बदबू उससे कभी अलग नहीं होती अतः हमें पहले मन को शुद्ध करना चाहिए।

900+ Kabir Ke Dohe in Hindi PDF Download

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इसे भी देखें: संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता पीडीएफ

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