bhagwat geeta shlok with meaning

Bhagwat Geeta Shlok With Meaning in Hindi PDF [Free Download]

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Bhagwat Geeta Shlok भगवत गीता श्लोक: कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध आरंभ होने से पहले, भगवान श्री कृष्ण के द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश हिंदू धर्म का प्रसिद्ध ग्रंथ बन गया। इस उपदेश को हम श्रीमद्भागवत गीता के नाम से जानते हैं। भगवान श्री कृष्ण के उपदेशों को 18 अध्याय और 700 श्लोकों में लिखा गया।

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Bhagwat Geeta Shlok With Meaning

आज के इस लेख में हम कुछ प्रसिद्ध भगवत गीता श्लोक का वर्णन करेंगे तथा इससे होने वाले लाभों के बारे में भी बात करेंगे। श्रीमद्भागवत गीता को बहुत कम शब्दों में समझने की कोशिश करें तो यह इस प्रकार से है: Bhagwat Geeta in Hindi PDF Download

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जब कुरुक्षेत्र के मैदान में कौरव और पांडव के बीच युद्ध का बिगुल बज गया उस वक्त अर्जुन के सामने उनके नात रिश्तेदार युद्ध के लिए खड़े थे परंतु अर्जुन इस बात से संकोच में थे कि मैं कैसे अपने ही परिवार के लोगों को जान से मारूंगा? परंतु यहां पर धर्म और अधर्म की लड़ाई थी इसलिए अर्जुन के सारथी और मार्गदर्शक भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को नहीं समझाते हैं कि यहां हमें अपना कर्तव्य निभाना है और हमारा कर्तव्य इस समय धर्म को बचाना है।

इस समय भगवान श्री कृष्ण जितनी भी बातें अर्जुन को बताएं उन सभी बातों को एक पुस्तक में पिरोया गया जिसे हम श्रीमद्भगवद्गीता कहते हैं। श्री कृष्ण को मानव इतिहास का पहला प्रेरक (motivator) अभी कहा जाता है। इस ग्रंथ में 700 श्लोक है और प्रत्येक श्लोक हमारे जीवन के लिए बहुत ही उपयोगी है।

bhagwat geeta ke shlok अर्थ सहित PDF Details

Bhagwat Geeta Shlok
PDFश्लोक अर्थ सहित
Nameश्रीमद्भगवद्गीता श्लोक अर्थ सहित PDF
Page No951
PDF Size4.06 MB
LanguageHindi
LinkAvailable ✅
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bhagwat geeta shlok with meaning in hindi

द्वितीय अध्याय, श्लोक 47

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

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इस श्लोक का अर्थ है: तुम्हारा अधिकार सिर्फ कर्म करने तक ही सीमित है ना कि उसके फलों की चिंता करने में। इसलिए निष्फल कर्म करो। यह सोचे बिना कि हमें इसका कोई फल मिलेगा या नहीं। बस आपका कर्म अच्छा होना चाहिए। परिणाम जो भी होगा वह आपके कर्म के अनुसार ही होगा।

इस श्लोक में चार तत्व मौजूद हैं

  • कर्म करने पर अपना अधिकार होना
  • कर्म का फल अपने हाथ में ना होना
  • कर्म करते समय फल की चिंता ना करना
  • फल की इच्छा ना रखना यह नहीं दर्शाता कि आप कर्म करना ही छोड़ दें।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते” अर्थात् तेरा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है। यहां पर भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा काम सिर्फ कर्म करना है इसके अलावा तुम्हारा किसी पर कोई भी अधिकार नहीं है। तुम निरंतर सही कर्म करते रहो।

“मा फलेषु कदाचन” अर्थात कभी भी कर्म फल की चिंता मत करो। यहां पर कहा गया है कि हमें बस सही कर्म करते रहना चाहिए उस कर्म का हमें क्या फल मिलेगा इसकी चिंता किए बगैर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

“मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि” अर्थात कर्म करते हुए फल की इच्छा ना करना क्योंकि फल हमारे बस में है ही नहीं। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं की हे अर्जुन! जब भी हम कोई कर्म कर रहे हो उस समय उस कर्म से होने वाली फल की चिंता कभी मत करें इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम कर्म करना ही छोड़ दें।

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द्वितीय अध्याय, श्लोक 23

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत॥

इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को ना कोई शस्त्र काट सकता है ना उसे अग्नि जला सकती। जल कभी गिला नहीं कर सकता और वायु इसे कभी सूखा नहीं सकती।

नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि – कोई शस्त्र छेद नहीं सकता।
नैनं दहति पावक: – आग कभी जला नहीं सकती।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो – जल कभी गिला नहीं कर सकता।
न शोषयति मारुत – हवा कभी सूखा नहीं सकती।

द्वितीय अध्याय के श्लोक 23 में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! आत्मा ऐसी है जिसे ना किसी शस्त्रों के द्वारा छेदा जा सकता है, ना ही आग के द्वारा जलाया सकता है। इसे ना तो पानी कभी भीगा सकता है और ना ही वायु कभी सुखा सकती है। अर्थात आत्मा अजर, अविनाशी और अनंत है।

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चतुर्थ अध्याय, श्लोक 8

परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

इस श्लोक का मतलब है:

परित्राणाय साधूनाम् – सदाचारी पुरुष की रक्षा के लिए।
विनाशाय च दुष्कृताम् – दुराचारी लोगों के विनाश के लिए।
धर्मसंस्थापनार्थाय – धर्म की पुनः स्थापना के लिए।
सम्भवामि युगे-युगे – मैं प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।

चतुर्थ अध्याय, श्लोक 8: भगवद्गीता में भगवन श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि सदाचारी पुरुषों की रक्षा करने के लिए, दुष्कर्म करने वाले दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की पुनर्स्थापना करने के लिए मैं खुद प्रत्येक युग में जन्म लेता हूँ।

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द्वितीय अध्याय, श्लोक 62

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
Bhagwat Geeta Shlok in Hindi PDF

इस श्लोक के चारो खंड में कहा गया है:

ध्यायतो विषयान्पुंसः – मनुष्य जब विषयों को मनन करता है।
सङ्गस्तेषूपजायते – तब उसमें सहवास उत्पन्न होता है।
सङ्गात्संजायते कामः – सहवास से कामप्रद उत्पन्न होती है।
कामात्क्रोधोऽभिजायते – कामशास्त्र से क्रोध उत्पन्न होता है॥

द्वितीय अध्याय, श्लोक 62: भगवद्गीता में उल्लेखित भाव यह है कि जब मनुष्य सांसारिक पदार्थों का चिंतन करता है, तो उसमें सहवास (भोग-विलास) की प्रवृत्ति होती है। भोग-विलास के कारण काम जन्म होता है और काम से क्रोध और ईर्ष्या उत्पन्न होता है। इससे मनुष्य का विनाश हो जाता है।

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चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

इस श्लोक का अर्थ है:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत: – हे भारत, जब-जब धर्म की क्षीणता होती है।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् – तब-तब मैं धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् अवतार लेता हूँ।

चतुर्थ अध्याय, श्लोक 7: भगवद्गीता में श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन को कहा जा रहा है कि हे भारत! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की अधिकता होती है तब-तब मैं धर्म का स्थापना कर अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लेता हूँ।

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आमतौर पर पूछे जाने वाले bhagwat geeta shlok with meaning पर सवाल (FAQs)

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